Monday, May 4, 2020







दानवीरों तुम लाखों का दान दो , हम गरीबों के जनाजे पे हेलीकॉप्टर से फूल बरसाएंगे .. 


कोरोना वारियर्स  रूठी हुई प्रेमिकायें नहीं है , जिन्हें हेलीकॉप्टर से फूल बरसाकर खुश किया जाए , 
ये भारत माता की वो संतान है जो जान की बाज़ी लगा कर ,हर सम्भव मदद कर रहे है । उन्हें प्रोत्साहन देना जरूरी है लेकिन एक वीडियो बना कर या किसी भी माध्यम से उन्हें शुभकामनाएं और शाबासी प्रेषित की जा सकती थी। वो हिंदुस्तान के  सभ्य पढ़े लिखे और समझदार लोग है जो दर्द और तकलीफ समझते है । एक ओर गरीब जनता है , सड़को पर पैदल चल कर रास्ता पार कर रही है , छोटे छोटे बच्चे भूखे प्यासे उनकी गोद में तड़प रहे है । दान वीर लोग लाखों का दान उस दरिद्र जनता को दो वक्त की दाल रोटी मिल सके इसीलिए दे रहे है , इसलिए नहीं कि लाखों रु हेलीकॉप्टर से फूल बरसाकर हवा में उड़ा दिए जाएं।धन का ये दुरुपयोग देख उन कोरोना वारियर्स का भी दिल दुखा होगा जिनके लिए ये किया गया । ये वक़्त नहीं है ये सब करने का । पैसा ज्यादा है तो आने वाले वक्त के लिए रखिये अभी पता नही ये स्थिति कब तक रहने वाली है । सरकारी खातों में धन का सदुपयोग हो न सिर्फ गरीब जनता के लिए मध्यम और उच्च मध्यम  वर्ग को रियायत की बात करनी चाहिए । माननीय मुख्यमंत्री जी के जन्मदिन पर रक्तदान शिविर किया गया । इस वक़्त जब मिलने से संक्रमण का खतरा है ।
रक्तदान कितना सेफ है और कितना सुरक्षित रख पाएंगे । सोचने वाली बात है । प्रेस फ्रीडम डे है उन सभी बड़े अखबारों को कोटिश प्रणाम जो सुबह हेलीकॉप्टर से गिरते हुए फ़ूल दिखाएंगे , लेकिन नीचे किस गरीब जनता के जनाजे पे गिरे ये नहीं दिखा पाएंगे । #AnshuHarsh . 


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#Narendramodi #PM #India 

Thursday, April 16, 2020


                                                           Manish Mundra                              words - Anshu Harsh



एक सुलतान जो मन का कबीर है 

  ज्यादा से ज्यादा किसी के काम आना सही मायने में सफलता है




मनीष  मूंदड़ा एक नाम जिसका फ़िल्मी दुनिया का सफर लगभग 2015 में " आँखों देखी  " से शुरू हुआ आज एक मुकाम हासिल कर चुका है।उनके बैनर तले  बनी फ़िल्में  मसान  धनक  कड़वी हवा और न्यूटन। नेशनल अवार्ड के लिए चुनी जा चुकी है।  ये सभी फिल्में फिल्म इंडस्ट्री में एक बदलाव की बयार ले कर आयी है।  बदलाव जो ज़मीन से जुड़ा है , वो ज़मीन जहाँ  से हम सभी जुड़े है और कही न कही फिल्मों के माध्यम से  अपनी बात की अभिव्यक्ति करने की कोशिश करते है।  शायद इसीलिए दर्शक वर्ग इन फिल्मों से एक जुड़ाव महसूस करता है।  हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म कामयाब और आने वाली फ़िल्में है  रामप्रसाद की तेहरवीं और आधार।  जल्द ही मनीष  डायरेक्शन की दुनियाँ में भी कदम रखने वाले है जिसकी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है इस वर्ष के आखिरी तक संभवतया शूटिंग पूरी हो जायगी।  आज जिस मुकाम पर मनीष   है वहाँ से लोगो के छोटे बड़े सपनो को पूरा करने में कोई कमी नहीं रखते  , चाहे वो पढ़ाई के लिए किसी की फीस देनी हो या या किसी का इलाज करवाना हो। फिल्म इंडस्ट्री में भी नए फिल्म मेकर्स  सहायता करने में कोई कमी नहीं रखते।  उनका सपना है ऑस्कर उन्हें मिले लेकिन पिछले साल  एक फिल्म जो उस दौड़ में थी उसे फाइनेंशल सपोर्ट कर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जो क़ाबिले तारीफ़ है।  

 जिस कालेज से वो स्वयं कर्ज़ा ले कर पढ़े वह अब उन्होंने पचास लाख रुपए में डिजिटल बोर्ड्स लगवा कर अभूतपूर्व कार्य किया है।  लीला फाउंडेशन के अंतर्गत मनीष  एक स्कूल एस फ़ोर्ड एकेडमी भी चलाते है जोधपुर के पास पेशावास  गाँव में  जहाँ लगभग 150 बच्चे  आठवीं तक की शिक्षा बिलकुल मुफ्त प्राप्त करते है। तथा उसके बाद की शिक्षा के लिए उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है।  उनकी यूनिफार्म और स्टेशनरी तक का खर्च मनीष स्वयं देखते है। वहां न केवल शिक्षा दी जाती है बल्कि सिलाई , कंप्यूटर और संगीत सीखाने की व्यवस्था भी है जिससे बच्चों का चहुँमुखी विकास हो।  साथ ही एक एस फोर्ड  गौशाला को भी मनीष सहयोग देते है जहाँ लगभग 211 गाय है । वहाँ  उन गायोँ की सेवा की जाती है जो दुधारू नहीं रही है , बूढी गायों की सेवा की जाती है  . कई गाय ऐसी भी है जो बच्चे भी देती है।  उनकी  देखरेख के लिए चार लोग रखे हुए है।  हाल ही में मनीष व् उनके पिताजी बद्रीदास मूंदड़ा  ने चार करोड़ चालीस लाख रु मथुरा दास माथुर अस्पताल जोधपुर को दान दिए है। जिससे अस्पताल में चालीस कॉटेज वार्ड बनवाएं  जायँगे। उनका मानना है जो है वो आज है , जो नेक कार्य करना चाहते हो वो अभी कर दो अपने माता पिता की मौजूदगी में उनके सानिध्यं में आशीष दुगनी मिलती है। 

कभी कभी ज़िन्दगी हुत जल्द इम्तिहान ले कर हमें तराश देना चाहती है और मन में ज अपने साथ अपनों के लिए कुछ करने का जूनून होता है तो ज़िन्दगी खुद  खुद नयी राहें नाती चली जाती है।


Few words In his own way - 

मूल रूप से तो मैं राजस्थान  जोधपुर का रहने वाला हूँ लेकिन मेरा  जन्म झारखण्ड के देवधर  में हुआ शाम का समय था और बहुत बारिश  हो रही थी और शहर  की बिजली बंद  थी। एक लालटेन की रौशनी से बहुत मुश्किल से कुछ नज़र आ रहा था। ज़िन्दगी का शुरूआती दौर बहुत कठिनाईओं भरा रहा सड़क पर जूस बेचने से ले कर एक पेट्रोकेमिकल कंपनी के एम् डी बनने का और उसके बाद फिल्म प्रोडक्शन बनने का सफर बहुत दिलचस्प रहा लेकिन ज़िन्दगी बहुत कुछ सीखा गयी , मेरी सीख मेरे भाव अब मेरी कविताओं और पेंटिंग्स के रूप में सामने आते है बहुत कुछ है जो  अनकहा है आज भी.  ज़िन्दगी ने बहुत सिखाया है मुझे। अपने इस सफर में अपनी ज़िन्दगी के लिए कुछ सिद्धांत बनाए है मैनें जिन्हे अपने  व्यवहार में अपनी ज़िन्दगी में उतारा है  . अपनी इज़्ज़त करो और खुद से प्यार करो तभी हम दूसरों को सम्मान दे पायेंगे ज़िन्दगी में हमसे मिलने वाला इंसान अपनी एक कहानी लिए हुए होता है हो सकता है उसकी दास्तां  भी उतनी ही दर्द भरी हो जितनी आपकी अपनी आपको  लगती है इसलिए हर शख्स का सम्मान  करो चाहे वो  कुछ देर के लिए  ही सही आपकी ज़िन्दगी में आया है।  


अपनी कथनी और करनी में अंतर मत रखो कोई भी रिश्ता  चाहे वो पर्सनल हो या प्रोफेशनल उसे निभाने के लिए आपके विचार और बातें दोनों ही साफ़ और  सच्चे होने चाहिए।
ज़िन्दगी की दौड़ में अगर दूसरों से आगे निकलना चाहते  है तो अपने हौंसले को कायम रखना बहुत जरूरी है कई बार  ऐसा होता  है जब मंजिल सामने होती है और उस तक पहुँचने के लिए भी हिम्मत जवाब दे देती है बस वही कदम जब लगता  है कि नाक़ामियाँ चरम  पर है तो हौंसले को टूटने मत देना बस वही से कामयाबी  करीब होती है। 


ज़िन्दगी के पुराने छोटे छोटे पल मुझे आज भी याद है बचपन में यूँ तो बहुत निडर था मैं कभी कभी ज़िन्दगी जब बहुत डराती थी वो छत के दरवाज़े के पीछे बैठ कर रोना मुझे आज भी कई बार याद आ जाता है।  अधपके आम तोड़ना और छत पे सोते हुए  गिनना मुझे ज़िन्दगी का खूबसूरत  पल याद दिला जाते है। पहला अनुभव ज़िन्दगी  का सदा साथ रहता है , पहला प्यार , पहली नौकरी पहला हवाई सफर , पहली विदेश यात्रा , अपने बच्चों को पहली बार गले लगाना , पहला सब बहुत अहम् होता है  जीवन में।  


जोधपुर से अपनी मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने करियर की शुरुआत भी  राजस्थान  से की।  अपनी मेहनत के दम पर सफलता हासिल करते हुए हिन्दुस्तान के बाहर कदम रखा और पिछले 12 सालो से अफ्रिका के नाइज़ीरिया में इंडोरामा फर्टिलाइज़र्स के सी इ ओ के रूप में काम कर रहा हूँ।   फिल्मे देखने का शौक बचपन से था , घरवालों से छुप  कर सिनेमा देखने की पुरानी यादे आज जहन में ताज़ी है लेकिन इस इंडस्ट्री में इतना कुछ करने के बारे में कभी बहुत गम्भीरता से नहीं सोचा था लेकिन कुछ ख्वाब होते है जो अंतर्मन में पलते  है उनमे से यह भी एक ख्वाब था और यह ख्वाब परिपक्व हो कर एक साकार रूप लेगा यह मैंने सोचा नहीं था।

उपरवाले का साथ और आर्शीवाद रहा की बहुत काम समय में  इतनी बड़ी इंडस्ट्री में अपने आपको बतुर प्रोड्यूसर  स्थापित किया ही है साथ ही नए लेखक , नए डाइरेक्टर्स को  भी मौका दिया है। फ़िल्मी दुनिया में दृश्यम फिल्म्स की स्थापना से युवा वर्ग में एक उत्साह का संचार है जहाँ नए और संघर्ष कर रहे वर्ग को आशा की किरण  नज़र आती है। दृश्यम फिल्म्स  की तरफ से पुरे भारत वर्ष से नई कहानिया आमंत्रित की जाती है । मेरा  मानना है की  लेखन में यानी किसी भी फिल्म  के कंटेंट में दम  होना चाहिए इसीलिए हम उन नयी कहानियों की खोज में है जो जमीन से जुडी है लेकिन भाषाओं और परम्पराओं की सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया के दिलो पर राज करने का दम रखती है।

दृश्यम फिल्म्स की हर फिल्म इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में जीत हासिल कर  दर्शक वर्ग का दिल जीत रही है और नेशनल अवार्ड या कोई भी बड़ा अवार्ड  मिलने पर मेरा ये मानना है की यह गर्व  की बात  है जब आपको यह सम्मान सरकार द्वारा  मिलता है तो ख़ुशी दुगनी हो जाती है की जिस क्वालिटी का कंटेंट हम दर्शकों को दे रहे है सरकार उसकी सराहना कर  रही है। नेशनल अवार्ड लेना मंजिल  नहीं है मेरे  लिए यह महज़ पड़ाव है आगे का रास्ता देखने के लिए। 
ऊपर  वाले का आशीर्वाद रहा और मैंने मेहनत  से वो सब पाया जिसके मैं ख़्वाब देखता था।  अब फिल्में बनाता हूँ , पेंटिंग , ट्रेवलिंग और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी का शौक है और लेखक भी कह सकते है पिछले साल अप्रेल में  " कुछ अधूरी बाते मन की "  मेरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है।  


(  मनीष  मूंदड़ा से बातचीत पर आधारित है -  अंशु हर्ष  )  Article was published In www.voiceofjaipur.com  #voiceofjaipur

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Friday, April 3, 2020



ज़िन्दगी की ख़ामोश आवाज़ सुनिए -- वो  पहले की तरह जीना चाहती है।  
                                                                                                             Article by - Anshu Harsh 

इन दिनों  एक आब्जर्वर के तौर पे इस दुनियाँ को देखूँ अगर,  तो वैश्विक महामारी का ये दौर पूरी दुनियाँ  के लिए कठिनतम समय है।  जहाँ एक ओर  हज़ारों लाखों की संख्या में लोग इस महामारी से पीड़ित हो कर मर रहे है , हिन्दुस्तान में आज भी कोरोना के नाम पे चुटकुलों का रेला निकल पड़ा है। सोशल मिडिया एक ऐसा माध्यम बना हुआ है जहाँ हर व्यक्ति अपने हिसाब से कुछ भी लिखता है , मोदी जी की थाली बजने की अपील शुकराना अदा करने का माध्यम था , उन लोगो के लिए जो इन कठिन और डरा देने वाली परिस्थियों में  देश की सेवा में लगे है।  
लेकिन लोगो ने एक दिन जनता कर्फ्यू को थाली बजा कर ऐसे जश्न मनाया जैसे एक दिन घर में रहकर कोई जग जीत लिया हो या थाली जोर जोर से बजाने  से कोरोना भाग जाएगा । लोगों  का जश्न देख कर मन व्यथित भी हुआ लेकिन एक विचार ये भी आया की ये जो लॉक डाउन वाला समय है बहुत मुश्किल है , घर में रहने की आदत नहीं , घर के काम करने की आदत नहीं और इसे सहजता से स्वीकार कर भी ले कठिन समय की जरूरत समझ कर कर भी ले तो , एक सोच एक विचार कमाई के साधन का एक चिंता की लकीर ले आता है माथे पे।  इस चिंता को कुछ देर के लिए ही सही ये उपहास करते लोग टेंशन कम कर रहे है।  सरकारी विभाग के कर्मचारी खुश है , बिना काम किये उनके लिए छुट्टियों का अवसर है लेकिन मझोले व्यापारी , निम्न दर्जे के व्यापारियों के साथ बड़ी कंपनियों का अस्तित्व भी खतरे है , कितने दिन तक वो अपने एम्पलॉयस को घर बैठे सैलेरी दे सकता है। एक चिंता का विषय हो जाएगा ।  हालाँकि सब कुछ ऑनलाइन होने से वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन है लेकिन आखिर कब तक कर पायेंगें सब पूरी दुनियाँ इस समय से गुज़र रहीं है इकोनॉमी का चक्र चलना बंद हो जायगा।  निम्न दर्जे के पास पैसे नहीं होंगें और जिनके पास पैसे होंगे लेकिन दुकानों पर सामान नहीं मिलेगा खाने के लिए। ये विचार नकारात्मक नहीं है एक दृष्टि है जो आगे परिस्थितियों को सोच रहीं है।  

अभी सबसे पहले हमें इस वाइरस से निजात पाना  है और जितना हम सरकारी आदेशों का पालन कर अपने अपने घरों में रहकर लॉक डाउन को सपोर्ट करेंगे। तो जल्द वो दिन आएगा जब फिर से सभी के काम शुरू हो जायंगें। नहीं तो ये सिलसिला आगे बढ़ता रहा तो स्थितियां बदतर होती जायगीं।  

  वैश्विक महामारी कोरोना आज विश्व के हर घर में एक डर पैदा किये हुए है
ये मानव द्वारा की गयी क्रियाओं की प्रतिक्रया है जो ये प्रकृति  दे रही है - बस अब सहन करने की क्षमता ख़त्म हुई।   एक अंधी दौड़ में मानव भाग रहा था किस और कोई नहीं जानता बस सबको सब हासिल करना था। इस वक़्त को हम कह रहे है परिवार के साथ बिताने वाला वक़्त तो सप्ताह के शनिवार और रविवार भी तो सदा रहे हमारे पास लेकिन हम रोज़ से ज्यादा व्यस्त हो जाते उनमें और गाड़ियां उठा कर चल देते कहीं। जबकि इन दो दिनों में पॉल्यूशन पर नियंत्रण कर सकते थे हम।  शादियों में अनावश्यक खाने पीने की वस्तुओं का प्रदर्शन जो बाद में वेस्ट बनता है।  इस पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।  जो मकान हम बनांते है उसे घर बनाना भूल जाते है।  देखा देखि की होड़ में चाहे पॉकेट इज़ाज़त दे या नहीं दे हम कई अनावश्यक यात्राएं कर आते।  फिर दौड़ शुरू होती  पैसा कमाने की ताकि उस इंस्टालमेंट को उतार सके. फिर रोज मर्रा की आपसी नोक झोक जो बड़े झगडे में बदल जाती और माहौल नकारात्मक हो जाता है ये नकारत्मकता वातावरण में घुल जाती।  कटते हुए पेड़ , हर घर में चलते हुए चार चार एयर कंडीशन और बेलगाम गाड़ियों का धुंआ धरती को बोझिल किये जा रहा है।  जिसका नतीजा आज सामने आ रहा है।  

ऐसा पहली बार हुआ है कि मंदिरों के पट भी बंद है , ये प्रकृति  और ईश्वर दोनों ही 
  अनकही मार दे रहे है  इंसान को जो हमें अब भी समय रहते समझनी है।  पाप का बोझ जो हरक्षेत्र में बढ़ा हुआ है उसे बेलेन्स करने के लिए ऐसा हो रहा है।  
ये वाइरस जिस तरह और जितनी तेजी से दुनियाँ में फैला है और इसके जो नतीजे सामने आ रहे है वो निश्चित तौर पर विज्ञान से परे परा विज्ञान की बात है।  सरकार , विज्ञान मेडिकल साइंस सब अपनी अपनी जगह अपना कार्य कर रहे है लेकिन ये अपील हर इंसान से है कि विचारों में क्रियाओं में जीवन में सकारात्मकता अपना कर सरकारी नियमों का पालन कर   और प्रार्थना कर हम इस बड़ी विपत्ति को दूर कर सकते है। 

इनफार्मेशन और ब्राडकास्टिंग डिपार्टमेंट के कहने से रामायण फिर से प्रसारित होगा दूरदर्शन पर ये बहुत अच्छा कदम है।  मनोरंजन के नाम पर जो हम देख रहे है वो हमारी संस्कृति में जहर घोलता हुआ मनोरंजन है।  

इस वक़्त ने हमें ये सोचने पर मज़बूर किया है की क्या था हम जिसके पीछे भाग रहे थे इतनी तेजी से , क्या था जिसे हम ट्रेज़र हंट की तरह ढूंढ रहे थे।  और इन सबमें हमनें खो दिया वो सुकून वो सुख , अपनों के साथ के पल।  ये मौक़ा मिला है सुधार जाने का यकीन मानियें।  ये दौर इसीलिए आया है , ज़िन्दगी की  खामोश आवाज़ सुनिए 
ज़िन्दगी पहले की तरह सादगी से जीना चाहती है।  

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Saturday, March 28, 2020

                                  आसान नहीं था - केकवॉक              शब्द - अंशु हर्ष                      राम कमल मुखर्जी का नाम फ़िल्मी दुनियाँ के लेखक और तेजतर्रार पत्रकार के रूप में जाना जाता है। लेकिन हाल ही में राम ने एक शार्ट फिल्म बना कर डायरेक्शन की दुनियाँ में कदम रखा है सिम्पली जयपुर की एडिटर अंशु हर्ष से हुई बात चीत में रामकमल ने फिल्म से जुड़े अपने अनुभव साझा किये                                           अंशु -आपकी फिल्म केकवॉक रिलीज हुई है। कैसा महसूस हो रहा है एक एक नया कदम उठाकर ?           रामकमल-  सच कहूँ तो  मैं भी रिलीज की प्रक्रिया और इसके तकनीकी पहलुओं से जुड़ा हुआ हूं,तो काम के चलते मुझे       वास्तव में पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं मिला कि मैं उस लम्हें को  महसूस कर सकूँ 
अंशु - फिल्म का नाम केक वाक क्यों रखा                                                        रामकमल-  कुछ अलग करने का मन था और हमें स्क्रिप्ट पर काफी काम किया , चंद्रोदय पाल मुझसे जुड़े और संवाद पर काम किया। फिल्म का नाम और टैग लाईन  "लाइफ इज़ ए केकवॉक" मेरे द्वारा दी गई थी, क्योंकि मैं कुछ बहुत ही आकर्षक शीर्षक चाहता था जो फिल्म के विषय के साथ जाना चाहिए।
अंशु  -फिल्म के लिए आपने ईशा को क्यों चुना ?                                                   रामकमल- कुछ सालों पहले  मैं ईशा , रितेश देशमुख और सूर्या के साथ एक फीचर फिल्म बनाना चाहता था। लेकिन उस पर काम नहीं हो सका ईशा अभी भी मुझे उस स्क्रिप्ट पर फिर से काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है। जब मैं हेमा मालिनी की बायोग्राफ़ी  बियॉन्ड द ड्रीमगर्ल लिख रहा था, तब मैं ईशा से एक इंटरव्यू  के लिए मिला था। पर उस वक़्त  ईशा अपनी पर्सनल लाइफ में बिजी थी तभी हमने उसके साथ एक शॉर्ट फिल्म करने की सोची। मैं अपने बैनर असॉर्टेड  मोशन पिक्चर्स के तहतबनाना  चाहता था और ईशा से जब स्क्रिप्ट पर चर्चा हुई तो फिल्म में अभिनय करने की शर्त रख दी .
अंशु - ईशा ने एक लेखक और प्रोड्यूसर में एक डाइरेक्टर को कैसे खोजा ?
रामकमल - मुस्कुराते हुए ... मैं भी अचंभित हूँ .....वास्तव में, मैं किसी फिल्म के निर्देशन के बारे में सोचा नहीं था। इसका मुझे कोई व्यावहारिक और तकनीकी ज्ञान भी नहीं था इसलिए डर था। लेकिन मैं उस विश्वास  के लिए ईशा को पूरा श्रेय दूंगा, उन्होंने मुझे यह एहसास दिलाया कि मैं यह कर सकता हूं।आज के समय में हमें ऐसे इंसान नहीं मिलते।
अंशु - आपने फुल लेंथ फीचर फिल्म क्यों नहीं बनाई?
राम कमल - मैंने कोशिश की थी एक बार । निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि एक रचनात्मक निर्माता के रूप में। लेकिन बाद में मुझे अहसास हुआ कि मैंने अपना समय, ऊर्जा और विश्वास गलत लोगों के साथ निवेश किया। यह मेरे लिए  अनुभव था। फिर मैंने अपना सारा प्रयास किसी और के सपने में डाल दिया था, और उनका कोई मूल्य नहीं था। अभी ईशा के साथ ही एक फुल लेंथ फीचर फिल्म की प्लानिंग है और ईशा को अभी दुसरा बेबी होने वाला है तो हो सकता है थोड़ा समय लग जाये इस शुरुआत में . 

अंशु -ऐसा सुनने में आया है कि बंगाली फिल्म भी डाइरेक्ट करने का प्लान है ?
रामकमल - हमने पिछले साल फिल्म की घोषणा की थी।देखते है कब तक हम इस सपने को पूरा कर पायंगे 
 लेकिन जब हमने स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट खत्म किया, तो मूल  कहानी जिसकी थी  प्रोजेक्ट को छोड़ कर बाहर हो गया हमनें कहा भी  हम कहानी में कोई बदलाव नहीं करते हैं और इसे ठीक उसी तरह शूट करते हैं जिस तरह से लिखा गया है। जब हमने महसूस किया कि बॉन्डिंग काम नहीं कर पाएगी । वास्तव में हमने कास्ट और लोकेशन को भी लॉक कर दिया था।
अंशु - इनसबके बीच लेखक रामकमल कही खो गए है ?
रामकमल -- नहीं ऐसा नहीं है एक बायो ग्राफ़ी पर काम कर रहा हूँ और एक हिस्टोरिकल फिक्शन भी लिख रहा हूँ जिसके लिए प्रकाशक की तलाश है।  हो सकता है ये पढ़ने के बाद कोई प्रकाशक मुझे अप्प्रोच करे। 
अंशु - सवालों का सिलसिला खतम करने का मन तो नहीं है लेकिन हेमा जी के साथ फिल्म बनाने की कोई योजना है आपकी
रामकमल - हॅसते हुए  अभी तो हेमा जी इलेक्शन में बिजी है और उन्हें फिल्म के लिए अप्प्रोच करने से पहले में इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहता हूँ की कहानी और किरदार उनके मुताबिक़ हो।  वैसे ये मेरे लिए भी एक सपने की तरह है की मैं हेमा जी के लिए फिल्म डाइरेक्ट करू . 
Interview Date -14 March 2019 #Interview by #AnshuHarsh #RamKamalMukherjee #Writer #director #producer 
#ishadeol #cakewalk #shortfilm Published in #SimplyJaipur March 2019  
 
 




आजकल फ़िल्मी प्रेम कहानी में लड़का लड़की  के साथ "कड़वी हवा " भी है - संजय मिश्रा 
                                                                                                                                        शब्द - अंशु हर्ष 
                                                                                                                                         Anshu Harsh 

                                                                                                                                         

संजय मिश्रा  एक ऐसे  कलाकार जिन्होंने  सिनेमा  के परदे पर अलग अलग किरदारों को   अपनी अदाकारी से यादगार बनाया है  . गोलमाल , धमाल ,वेलकम और ऐसी  बहुत सी फिल्मों में परदे पर दर्शकों को गुदगुदाया है और देखने वालों  के मन में उस सिनेमा के उसी किरदार के रूप  में पहचान बनायीं है जिस किरदार को उन्होंने निभाया है । इस बात पर संजय कहते है कि ' किस्मत का एक दायरा होता है उस तक पहुंचने के लिए चलना  पड़ता है और मेरी किस्मत के दायरा का सिरा मुझे आँखों देखी तक जा कर मिला जहाँ से लोग संजय मिश्रा  को एक किरदार के नाम से अलग खुद के नाम से जानने लगे वही असली सम्मान होता है जो दर्शक आपको स्वयं देता है और मैं खुशनसीब हूँ की ये सम्मान मैंने मेहनत से पाया है।  आते ही छा  गए इंडस्ट्री में ऐसा नहीं हुआ।  " 

संजय से  पुछा अभी तक निभाए गए किरदारों में  से कौन  सा ऐसा किरदार है जिसे  संजय ने डूब कर  निभाया है तब संजय ने कहा कि में हर किरदार को डूब कर निभाता हूँ मेरे अंदर का कलाकार खुद उस किरदार में डूब जाता है कला के नवरस को हमें परदे पर चित्रित करना होता है और और यही एक कलाकार की परीक्षा होती है या उसकी कला के प्रति उसका समर्पण होता है की वो हर रस को अपनी कला के माध्यम से सफलतम चित्रित करे और  देखने वालो की निगाहों में समा जाये। "

नवरसों से कोई भी रस हो संजय ने हर फिल्म में एक अलग रस को निभा कर अभिनय के क्षेत्र में जो पहचान बनायीं है वो काबिले तारीफ है। कड़वी हवा के क़िरदार में संजय का अभिनय बहुत दमदार नज़र आने वाला है  संजय कहते है कि "उपरवाले का शुक्रगुज़ार हूँ कि मेरी झोली में कड़वी हवा जैसी फिल्म आयी , इसमें अभिनय कर के मुझे ये अहसास हो रहा कि मैंने समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाया है , इस  तरह का सिनेमा बनना चाहिए और लोगो को इसे देखना भी चाहिए।  प्रकर्ति  प्रभाव को हम सोच भी नहीं सकते वो दिल्ली में दिखने लगा है।  प्रशासन इसके प्रति सचेत हुआ है लेकिन   दायित्व है की प्रकर्ति के प्रति अपने व्यवहार को समय रहते सुधार ले वरना वो समय दूर नहीं है जब इस अर्थ का अनर्थ हो जायगा। इसी बात को हमने कड़वी हवा के माध्यम से दिखाने की कोशिश की है। "

इस तरह का सिनेमा जिसमे  हम सामाजिक सरोकारों की बात  करते है व्यावसायिक तौर पर काम चल पाती है लेकिन देखने वालों के दिलों पर एक सवाल जरूर छोड़ती है आँखों देखि के बाद इस तरह की फिल्मे फिर से बनने लगी है इस पर संजय का कहना है कि इस तरह की फिल्मों के सूत्रधार थे  सत्यजीत रे , श्याम बेनेगल सई परांजपे  और बहुत मुश्किल होता था ऐसा सिनेमा बनाना लेकिन अब कमर्शियल सिनेमा के पास भी दिखाने के लिए कुछ नहीं रह गया है इसीलिए फिल्मों की प्रेम कहानी में एक लड़का एक लड़की के साथ अब कड़वी हवा है। सिनेमा से साहित्य गायब सा हो गया है और जिस फिल्म में इसकी झलक नज़र आती है वो निश्चित तौर पर सफल फिल्म है दर्शक ऐसी फिल्मे पसंद कर रहे है   न्यूटन हो , आँखों देखी   मसान ये सभी सफल फिल्मों की श्रेणी में आती है और इनके प्रोडूसर मनीष मूंदड़ा को सलाम करता हूँ कि इस तरह का  सिनेमा इंडस्ट्री में फिर से लाने में वो सफल  हुए है। 

कड़वी हवा में  जो किरदार संजय ने निभाया है उसे निभा कर उन्होंने प्रकर्ति के प्रति अपनी एक जिम्मेदारी को निभाया है लोगो में  जागरूकता लाने के लिए क्योकि हिन्दुस्थान में सिनेमा और क्रिकेट दो ऐसी चीजे है जिनसे दर्शक और जनता जुड़ जाते है सरकार को भी इसके प्रति कुछ कदम बढ़ाने चाहिए की सामाजिक सरोकारों का सिनेमा आम जान तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे व्यावसायिक तौर पर भी और जिम्मेदारिक तौर पर भी।  अगर सरकार सहयोग देती है तो निश्चित तौर पर यह फिल्म एक क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग जैसे इश्यू पर प्रकाश डालती हुई जागरूकता सन्देश बन सकती है। शूटिंग के अनुभव की बात करू तो संजय कटे है कि हम खुशनसीब है कि हमें हवा पानी पर्याप्त मात्रा में अभी भी मिल रहा है बुंदेलखड और धौलपुर के ऐसे जगहों पर हमने शूटिंग की है जहाँ के हालात देख कर दिल दहल जाता है पानी लाने के लिए महिलाये , लड़किया कितनी दूर चल कर जाती है।  इस फिल्म के माध्यम से मैं थोड़ी भी जागरूकता ला सका तो मुझे वास्तविक ख़ुशी का अनुभव होगा संजय अपना काम कर चुका अब आपकी बारी है सोचने की , समझने की और इस कड़वी हवा को बेहतरीन बनाने की।

Date Of Interview - 16 November 2016 #Interview By #AnshuHarsh #SimplyJaipur 
#SanjaiMishra #KadviHawa #Envorment #Earth #Drishyamfilms #Water #Savewater 
 #Directed by #NilaMadhabPanda #ManishMundra #Producer 




Saturday, December 30, 2017

यादों के चरागों को जलाये हुए रखना ..अलविदा 2017

बीते हुए लम्हों की कसक साथ लिए वक़्त अपने रास्ते चला जा रहा है और हम उसे थामने की कोशिश में  ज़िन्दगी के सफ़र में चलते जा रहे है , चलते हुए कई साथ छूटे , कुछ नए कदम इस सफ़र में साथ चल दिये , अपनी नादानियों में चाँद से रूठे कभी सितारों की छांव में भी जले ... कभी अंधेरी राह में दिल जला कर उजाला किया तो कभी कांटों की चुभन के साथ फूलों को दिल में बसाया ...और ये सब मुमकिन हुआ वक़्त के दिए अनुभवों से ...सत्रहवां साल बहुत अहम होता है ज़िन्दगी में चाहे खुद का हो या सदी का जो यह साल सिखाता है वो एक कहानी बन प्रेरक बन जाता है ज़िन्दगी की किताब में ...चलिए चल देते है शब्दों की उंगली थाम बालिग़ वर्ष की ओर ... 
ये सोचते हुए ... यादों के चरागों को जलाये हुए रखना लंबा है सफ़र इसमें कहीं रात तो होगी ....बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी ....

Thursday, July 6, 2017

शब्द ही तो दुनिया तेरी मेरी ....

शब्द ही तो दुनिया तेरी मेरी ....
किसी से मुलाक़ात का पहला आत्मीयता भरा अभिवादन हो या किसी के लिखे गए शब्दो को पढ़ने से मिलने वाला सूकून शब्द ही तो है जो हमें किसी से जोड़ते है।  कभी लिखे गए कभी बोले गए शब्द ही है जो एक नयी दुनिया बना देते है हमारे चारो तरफ ।  प्रेम , हौसला , हिम्मत , प्रोत्साहन ,  मार्गदर्शन , सम्मान सब शब्द ही तो जो जीवन को आधार देते है। इनका जन्म विचार से होता है और फिर ये व्यवहार में उतर आते है। ये व्यवहार हमें रिश्तो में बाँध देता है और फिर हर शख्स सूकून तलाशता है उस रिश्ते में उस व्यवहार से , शब्दो से।  शब्द कभी मुस्कुराते है कभी राजे दिल बयां  करते है , शब्दो से ही आस है विश्वास है और कभी जब शब्द रूठ जाते है तो खामोशी का रूप ले एक अलग अंदाज में नज़र आते है। तब हम वो भी सुन और समझ लेते है जो किसी ने कभी कहा भी नहीं।  शब्दो से ही तो जीवन में गहराई है । वो गहराई जिसका पार  पाना कभी कभी संभव नहीं होता मन डूबता चला जाता है  उस गहराई में जहाँ  से लौट आना असंभव सा लगता है।  
जीवन की ख़ूबसूरती भी तो शब्दों से बयां होती है , शब्द ही तो हमें जीवन की राहें दिखाते है कभी वो राहें जँहा  भीड़ है और कभी सुकून भरी राहे  जंहा तन्हाई है और सिर्फ हम है अपने शब्दो के साथ। हमारी कल्पनाओ को एक रूप देते ये शब्द हमारे जीवन की कहानी लिखते है , हमारे सपनो को एक रूप देते है।
मेरे शब्द मेरी कलम से निकले मेरे जस्बात मेरी बाते मेरे जीवन के अनुभव है।  मुझे नहीं पता ये किसी के जीवन को  बदलने की कितनी ताकत रखते है लेकिन जब मेरी ख़ामोशी को समझकर ये शब्द बाहर निकलते है मेरी कलम से तो मेरे  मन के समंदर में उठती लहरो को सुकून मिलता है।