Thursday, January 5, 2012

सर्दी की धूप

सर्दियों की धूप में


घर के खुले आँगन के एक कोने में

लगा हुआ था माँ का चुल्हा

जिस पर पकती थी

कडकडाती ठण्ड में

मक्का और बाजरे की रोटिया

आँगन की धूप में बैठ कर

वो गरमा गरम खाना

गुनगुनी धूप का आनंद और

और वो स्वादिष्ट खाना /

उसी धूप में बैठ माँ

उंगलियों पर सलाईया नचाती थी और

नए नए स्वेटर बना सभी को पहनाया करती थी

बैठ पड़ोसन के पास अपने अनुभव सुनाती थी

कभी नयी डिजाइन तो कभी नया स्वाद

सहेलियों के साथ सर्दी की धूप का

अलग ही था अंदाज /

सर्दी की धूप तो तभी सुहाती थी

जब तेज सर्दी में भी

सूरज की किरणे मेरे आंगन में उतर जाती थी

और अब

वह आंगन कहा अब तो फ्लेट है

और चूल्हे की जगह

माइक्रोवेव और हॉट प्लेट है

अब इतना समय कहा की फ्लेट से उतर

गार्डन में धूप का आनंद लेने जाया जाये

अब तो बस ये होता है

रूम हीटर चलाया जाए और

फेसबुक पर ही दोस्तों से से गप लगा ली जाय

हाथ के बने स्वेटर अब कौन पहनता है

ब्रांडेड के बारे में नयी जानकारी इन्टरनेट दे देता है

सर्दी की धूप तो अब भी निकलती है

पर उसका आनंद लेने वाली जिन्दगिया

चार दिवारी में केद रहती है /

2 comments:

  1. "वह आंगन कहा अब तो फ्लेट है
    और चूल्हे की जगह
    माइक्रोवेव और हॉट प्लेट है
    अब इतना समय कहा की फ्लेट से उतर
    गार्डन में धूप का आनंद लेने जाया जाये
    अब तो बस ये होता है
    रूम हीटर चलाया जाए और
    फेसबुक पर ही दोस्तों से से गप लगा ली जाय"

    'सर्दी की धूप' के माध्यम से पिछली मधुर यादों को ताजा किया गया है, जो पाठक को भी गुदगुदाता है |
    - शून्य आकांक्षी

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  2. अतीत और आज का सेतु हैं यह कविता।

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