Friday, April 3, 2020



ज़िन्दगी की ख़ामोश आवाज़ सुनिए -- वो  पहले की तरह जीना चाहती है।  
                                                                                                             Article by - Anshu Harsh 

इन दिनों  एक आब्जर्वर के तौर पे इस दुनियाँ को देखूँ अगर,  तो वैश्विक महामारी का ये दौर पूरी दुनियाँ  के लिए कठिनतम समय है।  जहाँ एक ओर  हज़ारों लाखों की संख्या में लोग इस महामारी से पीड़ित हो कर मर रहे है , हिन्दुस्तान में आज भी कोरोना के नाम पे चुटकुलों का रेला निकल पड़ा है। सोशल मिडिया एक ऐसा माध्यम बना हुआ है जहाँ हर व्यक्ति अपने हिसाब से कुछ भी लिखता है , मोदी जी की थाली बजने की अपील शुकराना अदा करने का माध्यम था , उन लोगो के लिए जो इन कठिन और डरा देने वाली परिस्थियों में  देश की सेवा में लगे है।  
लेकिन लोगो ने एक दिन जनता कर्फ्यू को थाली बजा कर ऐसे जश्न मनाया जैसे एक दिन घर में रहकर कोई जग जीत लिया हो या थाली जोर जोर से बजाने  से कोरोना भाग जाएगा । लोगों  का जश्न देख कर मन व्यथित भी हुआ लेकिन एक विचार ये भी आया की ये जो लॉक डाउन वाला समय है बहुत मुश्किल है , घर में रहने की आदत नहीं , घर के काम करने की आदत नहीं और इसे सहजता से स्वीकार कर भी ले कठिन समय की जरूरत समझ कर कर भी ले तो , एक सोच एक विचार कमाई के साधन का एक चिंता की लकीर ले आता है माथे पे।  इस चिंता को कुछ देर के लिए ही सही ये उपहास करते लोग टेंशन कम कर रहे है।  सरकारी विभाग के कर्मचारी खुश है , बिना काम किये उनके लिए छुट्टियों का अवसर है लेकिन मझोले व्यापारी , निम्न दर्जे के व्यापारियों के साथ बड़ी कंपनियों का अस्तित्व भी खतरे है , कितने दिन तक वो अपने एम्पलॉयस को घर बैठे सैलेरी दे सकता है। एक चिंता का विषय हो जाएगा ।  हालाँकि सब कुछ ऑनलाइन होने से वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन है लेकिन आखिर कब तक कर पायेंगें सब पूरी दुनियाँ इस समय से गुज़र रहीं है इकोनॉमी का चक्र चलना बंद हो जायगा।  निम्न दर्जे के पास पैसे नहीं होंगें और जिनके पास पैसे होंगे लेकिन दुकानों पर सामान नहीं मिलेगा खाने के लिए। ये विचार नकारात्मक नहीं है एक दृष्टि है जो आगे परिस्थितियों को सोच रहीं है।  

अभी सबसे पहले हमें इस वाइरस से निजात पाना  है और जितना हम सरकारी आदेशों का पालन कर अपने अपने घरों में रहकर लॉक डाउन को सपोर्ट करेंगे। तो जल्द वो दिन आएगा जब फिर से सभी के काम शुरू हो जायंगें। नहीं तो ये सिलसिला आगे बढ़ता रहा तो स्थितियां बदतर होती जायगीं।  

  वैश्विक महामारी कोरोना आज विश्व के हर घर में एक डर पैदा किये हुए है।
ये मानव द्वारा की गयी क्रियाओं की प्रतिक्रया है जो ये प्रकृति  दे रही है - बस अब सहन करने की क्षमता ख़त्म हुई।   एक अंधी दौड़ में मानव भाग रहा था किस और कोई नहीं जानता बस सबको सब हासिल करना था। इस वक़्त को हम कह रहे है परिवार के साथ बिताने वाला वक़्त तो सप्ताह के शनिवार और रविवार भी तो सदा रहे हमारे पास लेकिन हम रोज़ से ज्यादा व्यस्त हो जाते उनमें और गाड़ियां उठा कर चल देते कहीं। जबकि इन दो दिनों में पॉल्यूशन पर नियंत्रण कर सकते थे हम।  शादियों में अनावश्यक खाने पीने की वस्तुओं का प्रदर्शन जो बाद में वेस्ट बनता है।  इस पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।  जो मकान हम बनांते है उसे घर बनाना भूल जाते है।  देखा देखि की होड़ में चाहे पॉकेट इज़ाज़त दे या नहीं दे हम कई अनावश्यक यात्राएं कर आते।  फिर दौड़ शुरू होती  पैसा कमाने की ताकि उस इंस्टालमेंट को उतार सके. फिर रोज मर्रा की आपसी नोक झोक जो बड़े झगडे में बदल जाती और माहौल नकारात्मक हो जाता है ये नकारत्मकता वातावरण में घुल जाती।  कटते हुए पेड़ , हर घर में चलते हुए चार चार एयर कंडीशन और बेलगाम गाड़ियों का धुंआ धरती को बोझिल किये जा रहा है।  जिसका नतीजा आज सामने आ रहा है।  

ऐसा पहली बार हुआ है कि मंदिरों के पट भी बंद है , ये प्रकृति  और ईश्वर दोनों ही 
  अनकही मार दे रहे है  इंसान को जो हमें अब भी समय रहते समझनी है।  पाप का बोझ जो हरक्षेत्र में बढ़ा हुआ है उसे बेलेन्स करने के लिए ऐसा हो रहा है।  
ये वाइरस जिस तरह और जितनी तेजी से दुनियाँ में फैला है और इसके जो नतीजे सामने आ रहे है वो निश्चित तौर पर विज्ञान से परे परा विज्ञान की बात है।  सरकार , विज्ञान मेडिकल साइंस सब अपनी अपनी जगह अपना कार्य कर रहे है लेकिन ये अपील हर इंसान से है कि विचारों में क्रियाओं में जीवन में सकारात्मकता अपना कर सरकारी नियमों का पालन कर   और प्रार्थना कर हम इस बड़ी विपत्ति को दूर कर सकते है। 

इनफार्मेशन और ब्राडकास्टिंग डिपार्टमेंट के कहने से रामायण फिर से प्रसारित होगा दूरदर्शन पर ये बहुत अच्छा कदम है।  मनोरंजन के नाम पर जो हम देख रहे है वो हमारी संस्कृति में जहर घोलता हुआ मनोरंजन है।  

इस वक़्त ने हमें ये सोचने पर मज़बूर किया है की क्या था हम जिसके पीछे भाग रहे थे इतनी तेजी से , क्या था जिसे हम ट्रेज़र हंट की तरह ढूंढ रहे थे।  और इन सबमें हमनें खो दिया वो सुकून वो सुख , अपनों के साथ के पल।  ये मौक़ा मिला है सुधार जाने का यकीन मानियें।  ये दौर इसीलिए आया है , ज़िन्दगी की  खामोश आवाज़ सुनिए 
ज़िन्दगी पहले की तरह सादगी से जीना चाहती है।  

#NarendraModi #Corona #India #Life #Doordarshan #Ramayan #PrakashJavadekar 

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#AnshuHarsh 

Saturday, March 28, 2020

                                  आसान नहीं था - केकवॉक              शब्द - अंशु हर्ष                      राम कमल मुखर्जी का नाम फ़िल्मी दुनियाँ के लेखक और तेजतर्रार पत्रकार के रूप में जाना जाता है। लेकिन हाल ही में राम ने एक शार्ट फिल्म बना कर डायरेक्शन की दुनियाँ में कदम रखा है सिम्पली जयपुर की एडिटर अंशु हर्ष से हुई बात चीत में रामकमल ने फिल्म से जुड़े अपने अनुभव साझा किये                                           अंशु -आपकी फिल्म केकवॉक रिलीज हुई है। कैसा महसूस हो रहा है एक एक नया कदम उठाकर ?           रामकमल-  सच कहूँ तो  मैं भी रिलीज की प्रक्रिया और इसके तकनीकी पहलुओं से जुड़ा हुआ हूं,तो काम के चलते मुझे       वास्तव में पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं मिला कि मैं उस लम्हें को  महसूस कर सकूँ 
अंशु - फिल्म का नाम केक वाक क्यों रखा                                                        रामकमल-  कुछ अलग करने का मन था और हमें स्क्रिप्ट पर काफी काम किया , चंद्रोदय पाल मुझसे जुड़े और संवाद पर काम किया। फिल्म का नाम और टैग लाईन  "लाइफ इज़ ए केकवॉक" मेरे द्वारा दी गई थी, क्योंकि मैं कुछ बहुत ही आकर्षक शीर्षक चाहता था जो फिल्म के विषय के साथ जाना चाहिए।
अंशु  -फिल्म के लिए आपने ईशा को क्यों चुना ?                                                   रामकमल- कुछ सालों पहले  मैं ईशा , रितेश देशमुख और सूर्या के साथ एक फीचर फिल्म बनाना चाहता था। लेकिन उस पर काम नहीं हो सका ईशा अभी भी मुझे उस स्क्रिप्ट पर फिर से काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है। जब मैं हेमा मालिनी की बायोग्राफ़ी  बियॉन्ड द ड्रीमगर्ल लिख रहा था, तब मैं ईशा से एक इंटरव्यू  के लिए मिला था। पर उस वक़्त  ईशा अपनी पर्सनल लाइफ में बिजी थी तभी हमने उसके साथ एक शॉर्ट फिल्म करने की सोची। मैं अपने बैनर असॉर्टेड  मोशन पिक्चर्स के तहतबनाना  चाहता था और ईशा से जब स्क्रिप्ट पर चर्चा हुई तो फिल्म में अभिनय करने की शर्त रख दी .
अंशु - ईशा ने एक लेखक और प्रोड्यूसर में एक डाइरेक्टर को कैसे खोजा ?
रामकमल - मुस्कुराते हुए ... मैं भी अचंभित हूँ .....वास्तव में, मैं किसी फिल्म के निर्देशन के बारे में सोचा नहीं था। इसका मुझे कोई व्यावहारिक और तकनीकी ज्ञान भी नहीं था इसलिए डर था। लेकिन मैं उस विश्वास  के लिए ईशा को पूरा श्रेय दूंगा, उन्होंने मुझे यह एहसास दिलाया कि मैं यह कर सकता हूं।आज के समय में हमें ऐसे इंसान नहीं मिलते।
अंशु - आपने फुल लेंथ फीचर फिल्म क्यों नहीं बनाई?
राम कमल - मैंने कोशिश की थी एक बार । निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि एक रचनात्मक निर्माता के रूप में। लेकिन बाद में मुझे अहसास हुआ कि मैंने अपना समय, ऊर्जा और विश्वास गलत लोगों के साथ निवेश किया। यह मेरे लिए  अनुभव था। फिर मैंने अपना सारा प्रयास किसी और के सपने में डाल दिया था, और उनका कोई मूल्य नहीं था। अभी ईशा के साथ ही एक फुल लेंथ फीचर फिल्म की प्लानिंग है और ईशा को अभी दुसरा बेबी होने वाला है तो हो सकता है थोड़ा समय लग जाये इस शुरुआत में . 

अंशु -ऐसा सुनने में आया है कि बंगाली फिल्म भी डाइरेक्ट करने का प्लान है ?
रामकमल - हमने पिछले साल फिल्म की घोषणा की थी।देखते है कब तक हम इस सपने को पूरा कर पायंगे 
 लेकिन जब हमने स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट खत्म किया, तो मूल  कहानी जिसकी थी  प्रोजेक्ट को छोड़ कर बाहर हो गया हमनें कहा भी  हम कहानी में कोई बदलाव नहीं करते हैं और इसे ठीक उसी तरह शूट करते हैं जिस तरह से लिखा गया है। जब हमने महसूस किया कि बॉन्डिंग काम नहीं कर पाएगी । वास्तव में हमने कास्ट और लोकेशन को भी लॉक कर दिया था।
अंशु - इनसबके बीच लेखक रामकमल कही खो गए है ?
रामकमल -- नहीं ऐसा नहीं है एक बायो ग्राफ़ी पर काम कर रहा हूँ और एक हिस्टोरिकल फिक्शन भी लिख रहा हूँ जिसके लिए प्रकाशक की तलाश है।  हो सकता है ये पढ़ने के बाद कोई प्रकाशक मुझे अप्प्रोच करे। 
अंशु - सवालों का सिलसिला खतम करने का मन तो नहीं है लेकिन हेमा जी के साथ फिल्म बनाने की कोई योजना है आपकी
रामकमल - हॅसते हुए  अभी तो हेमा जी इलेक्शन में बिजी है और उन्हें फिल्म के लिए अप्प्रोच करने से पहले में इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहता हूँ की कहानी और किरदार उनके मुताबिक़ हो।  वैसे ये मेरे लिए भी एक सपने की तरह है की मैं हेमा जी के लिए फिल्म डाइरेक्ट करू . 
Interview Date -14 March 2019 #Interview by #AnshuHarsh #RamKamalMukherjee #Writer #director #producer 
#ishadeol #cakewalk #shortfilm Published in #SimplyJaipur March 2019  
 
 




आजकल फ़िल्मी प्रेम कहानी में लड़का लड़की  के साथ "कड़वी हवा " भी है - संजय मिश्रा 
                                                                                                                                        शब्द - अंशु हर्ष 
                                                                                                                                         Anshu Harsh 

                                                                                                                                         

संजय मिश्रा  एक ऐसे  कलाकार जिन्होंने  सिनेमा  के परदे पर अलग अलग किरदारों को   अपनी अदाकारी से यादगार बनाया है  . गोलमाल , धमाल ,वेलकम और ऐसी  बहुत सी फिल्मों में परदे पर दर्शकों को गुदगुदाया है और देखने वालों  के मन में उस सिनेमा के उसी किरदार के रूप  में पहचान बनायीं है जिस किरदार को उन्होंने निभाया है । इस बात पर संजय कहते है कि ' किस्मत का एक दायरा होता है उस तक पहुंचने के लिए चलना  पड़ता है और मेरी किस्मत के दायरा का सिरा मुझे आँखों देखी तक जा कर मिला जहाँ से लोग संजय मिश्रा  को एक किरदार के नाम से अलग खुद के नाम से जानने लगे वही असली सम्मान होता है जो दर्शक आपको स्वयं देता है और मैं खुशनसीब हूँ की ये सम्मान मैंने मेहनत से पाया है।  आते ही छा  गए इंडस्ट्री में ऐसा नहीं हुआ।  " 

संजय से  पुछा अभी तक निभाए गए किरदारों में  से कौन  सा ऐसा किरदार है जिसे  संजय ने डूब कर  निभाया है तब संजय ने कहा कि में हर किरदार को डूब कर निभाता हूँ मेरे अंदर का कलाकार खुद उस किरदार में डूब जाता है कला के नवरस को हमें परदे पर चित्रित करना होता है और और यही एक कलाकार की परीक्षा होती है या उसकी कला के प्रति उसका समर्पण होता है की वो हर रस को अपनी कला के माध्यम से सफलतम चित्रित करे और  देखने वालो की निगाहों में समा जाये। "

नवरसों से कोई भी रस हो संजय ने हर फिल्म में एक अलग रस को निभा कर अभिनय के क्षेत्र में जो पहचान बनायीं है वो काबिले तारीफ है। कड़वी हवा के क़िरदार में संजय का अभिनय बहुत दमदार नज़र आने वाला है  संजय कहते है कि "उपरवाले का शुक्रगुज़ार हूँ कि मेरी झोली में कड़वी हवा जैसी फिल्म आयी , इसमें अभिनय कर के मुझे ये अहसास हो रहा कि मैंने समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाया है , इस  तरह का सिनेमा बनना चाहिए और लोगो को इसे देखना भी चाहिए।  प्रकर्ति  प्रभाव को हम सोच भी नहीं सकते वो दिल्ली में दिखने लगा है।  प्रशासन इसके प्रति सचेत हुआ है लेकिन   दायित्व है की प्रकर्ति के प्रति अपने व्यवहार को समय रहते सुधार ले वरना वो समय दूर नहीं है जब इस अर्थ का अनर्थ हो जायगा। इसी बात को हमने कड़वी हवा के माध्यम से दिखाने की कोशिश की है। "

इस तरह का सिनेमा जिसमे  हम सामाजिक सरोकारों की बात  करते है व्यावसायिक तौर पर काम चल पाती है लेकिन देखने वालों के दिलों पर एक सवाल जरूर छोड़ती है आँखों देखि के बाद इस तरह की फिल्मे फिर से बनने लगी है इस पर संजय का कहना है कि इस तरह की फिल्मों के सूत्रधार थे  सत्यजीत रे , श्याम बेनेगल सई परांजपे  और बहुत मुश्किल होता था ऐसा सिनेमा बनाना लेकिन अब कमर्शियल सिनेमा के पास भी दिखाने के लिए कुछ नहीं रह गया है इसीलिए फिल्मों की प्रेम कहानी में एक लड़का एक लड़की के साथ अब कड़वी हवा है। सिनेमा से साहित्य गायब सा हो गया है और जिस फिल्म में इसकी झलक नज़र आती है वो निश्चित तौर पर सफल फिल्म है दर्शक ऐसी फिल्मे पसंद कर रहे है   न्यूटन हो , आँखों देखी   मसान ये सभी सफल फिल्मों की श्रेणी में आती है और इनके प्रोडूसर मनीष मूंदड़ा को सलाम करता हूँ कि इस तरह का  सिनेमा इंडस्ट्री में फिर से लाने में वो सफल  हुए है। 

कड़वी हवा में  जो किरदार संजय ने निभाया है उसे निभा कर उन्होंने प्रकर्ति के प्रति अपनी एक जिम्मेदारी को निभाया है लोगो में  जागरूकता लाने के लिए क्योकि हिन्दुस्थान में सिनेमा और क्रिकेट दो ऐसी चीजे है जिनसे दर्शक और जनता जुड़ जाते है सरकार को भी इसके प्रति कुछ कदम बढ़ाने चाहिए की सामाजिक सरोकारों का सिनेमा आम जान तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे व्यावसायिक तौर पर भी और जिम्मेदारिक तौर पर भी।  अगर सरकार सहयोग देती है तो निश्चित तौर पर यह फिल्म एक क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग जैसे इश्यू पर प्रकाश डालती हुई जागरूकता सन्देश बन सकती है। शूटिंग के अनुभव की बात करू तो संजय कटे है कि हम खुशनसीब है कि हमें हवा पानी पर्याप्त मात्रा में अभी भी मिल रहा है बुंदेलखड और धौलपुर के ऐसे जगहों पर हमने शूटिंग की है जहाँ के हालात देख कर दिल दहल जाता है पानी लाने के लिए महिलाये , लड़किया कितनी दूर चल कर जाती है।  इस फिल्म के माध्यम से मैं थोड़ी भी जागरूकता ला सका तो मुझे वास्तविक ख़ुशी का अनुभव होगा संजय अपना काम कर चुका अब आपकी बारी है सोचने की , समझने की और इस कड़वी हवा को बेहतरीन बनाने की।

Date Of Interview - 16 November 2016 #Interview By #AnshuHarsh #SimplyJaipur 
#SanjaiMishra #KadviHawa #Envorment #Earth #Drishyamfilms #Water #Savewater 
 #Directed by #NilaMadhabPanda #ManishMundra #Producer 




Saturday, December 30, 2017

यादों के चरागों को जलाये हुए रखना ..अलविदा 2017

बीते हुए लम्हों की कसक साथ लिए वक़्त अपने रास्ते चला जा रहा है और हम उसे थामने की कोशिश में  ज़िन्दगी के सफ़र में चलते जा रहे है , चलते हुए कई साथ छूटे , कुछ नए कदम इस सफ़र में साथ चल दिये , अपनी नादानियों में चाँद से रूठे कभी सितारों की छांव में भी जले ... कभी अंधेरी राह में दिल जला कर उजाला किया तो कभी कांटों की चुभन के साथ फूलों को दिल में बसाया ...और ये सब मुमकिन हुआ वक़्त के दिए अनुभवों से ...सत्रहवां साल बहुत अहम होता है ज़िन्दगी में चाहे खुद का हो या सदी का जो यह साल सिखाता है वो एक कहानी बन प्रेरक बन जाता है ज़िन्दगी की किताब में ...चलिए चल देते है शब्दों की उंगली थाम बालिग़ वर्ष की ओर ... 
ये सोचते हुए ... यादों के चरागों को जलाये हुए रखना लंबा है सफ़र इसमें कहीं रात तो होगी ....बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी ....

Thursday, July 6, 2017

शब्द ही तो दुनिया तेरी मेरी ....

शब्द ही तो दुनिया तेरी मेरी ....
किसी से मुलाक़ात का पहला आत्मीयता भरा अभिवादन हो या किसी के लिखे गए शब्दो को पढ़ने से मिलने वाला सूकून शब्द ही तो है जो हमें किसी से जोड़ते है।  कभी लिखे गए कभी बोले गए शब्द ही है जो एक नयी दुनिया बना देते है हमारे चारो तरफ ।  प्रेम , हौसला , हिम्मत , प्रोत्साहन ,  मार्गदर्शन , सम्मान सब शब्द ही तो जो जीवन को आधार देते है। इनका जन्म विचार से होता है और फिर ये व्यवहार में उतर आते है। ये व्यवहार हमें रिश्तो में बाँध देता है और फिर हर शख्स सूकून तलाशता है उस रिश्ते में उस व्यवहार से , शब्दो से।  शब्द कभी मुस्कुराते है कभी राजे दिल बयां  करते है , शब्दो से ही आस है विश्वास है और कभी जब शब्द रूठ जाते है तो खामोशी का रूप ले एक अलग अंदाज में नज़र आते है। तब हम वो भी सुन और समझ लेते है जो किसी ने कभी कहा भी नहीं।  शब्दो से ही तो जीवन में गहराई है । वो गहराई जिसका पार  पाना कभी कभी संभव नहीं होता मन डूबता चला जाता है  उस गहराई में जहाँ  से लौट आना असंभव सा लगता है।  
जीवन की ख़ूबसूरती भी तो शब्दों से बयां होती है , शब्द ही तो हमें जीवन की राहें दिखाते है कभी वो राहें जँहा  भीड़ है और कभी सुकून भरी राहे  जंहा तन्हाई है और सिर्फ हम है अपने शब्दो के साथ। हमारी कल्पनाओ को एक रूप देते ये शब्द हमारे जीवन की कहानी लिखते है , हमारे सपनो को एक रूप देते है।
मेरे शब्द मेरी कलम से निकले मेरे जस्बात मेरी बाते मेरे जीवन के अनुभव है।  मुझे नहीं पता ये किसी के जीवन को  बदलने की कितनी ताकत रखते है लेकिन जब मेरी ख़ामोशी को समझकर ये शब्द बाहर निकलते है मेरी कलम से तो मेरे  मन के समंदर में उठती लहरो को सुकून मिलता है।

Wednesday, July 5, 2017

दर्द की सीख

कुछ दर्द जीने लगते है हमारे साथ 
हमारे अंदर , 
गहराइयों तक अपनी जड़े जमाये हुए 
खिलते है उन पर फूल भी 
जो महकते है जीवन भर 
दब जाते है ज़िन्दगी की ज़मीन में वो दर्द 
लेकिन साथ नहीं छोड़ते 
क्योकि वही दर्द तो हमें जीना सिखाते 
कुछ बाते ठहर जाती है 
मन के किसी कोने में दबी हुई 
उलझी हुई 
यही  ठहराव  तो बैचैन किये जाता है 
कभी कभी 
पता नहीं ज़िन्दगी हमें पढ़ती है 
या हम ज़िन्दगी को पढ़ने की कोशिश करते है .

Friday, May 19, 2017

पहले प्यार का पहला ख़त 

पहले प्यार का पहला ख़त  
शनिवार को लिखा 
 क्योकि सुना  था कही 
 शनिवार को शुरू हुआ काम स्थाई होता है 
 और यही तो मैं चाहता था 
 लिखते रहना हर वक़्त 
 क्योकि
 लिखते वक़्त 
हर लम्हा मैं सोचु तुम्हे 
 बताऊ तुम्हे उस वक़्त के बारे में 
 जो   बीत रहा है तुम्हारे बिना 
 तुम्हारी यादो के साथ ……