Monday, February 4, 2013

एक लम्हा बहुत है

मैं इस लम्हे में  सदिया देखता हूँ .....
तुम्हारे साथ का एक लम्हा बहुत है .
यु तो ज़िन्दगी बिताते है लोग प्यार में ...
.लेकिन तुम्हारे प्यार का एक लम्हा बहुत है .
सुना है कई बार ज़िन्दगी गुज़र जाती है इंतज़ार में ..
.अंतहीन इंतज़ार से तो एक नज़र प्यार से देखना बहुत है
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी यु गुज़रती जायगी
ख़ुशी और प्यार से गुजारा एक लम्हा बहुत है .

ज़रा आहिस्ता चल

बरसात है कुछ तेज ज़रा आहिस्ता चल
दिल में कुछ बाते है दबी ज़रा आहिस्ता चल
मेरे दिल में  ही नहीं तेरे दिल में  भी है
दुआ एक तेज बारिश की ज़रा आहिस्ता चल
तुमसे मिलना और बिछड़ जाना है
बस इस बारिश का साथ है ज़रा आहिस्ता चल
ज़िन्दगी के सफ़र में दो न दो मेरा साथ
बस इस बारिश की मर्ज़ी है ज़रा आहिस्ता चल ............

Tuesday, November 27, 2012

सपनो के नए रंग

 
एक छोटी सी चिड़िया ....
उड़ने को आतुर
पर मन में घबराहट
विस्तृत नील गगन को देख
और एक दिन ....
मिला एक साथी
जो उड़ता था उन्मुक्त गगन में
पुकारा उसने चिड़िया को
चलो एक नयी उड़ान दे सपनो को
चिड़िया घबराई पर
थाम कर हाथ
अपने साथी का
पंख पसार खुले गगन में आई ..
सपने खिले नया रंगों में ...
पंखो में नयी जान आई
अब चिड़िया भर रही उन्मुक्त उड़ान
इन्द्रधनुषी रंगों से दुनिया रंगीन बनायीं .

 

Monday, November 19, 2012

बस की बात

हवा की तेज़ सरसराहट से
शाख से अलग हुआ पत्ता
इठलाता , झूमता
घूमता हुआ इधर उधर
बह चला नदी के पानी में
तैरता हुआ ....बोला
ओह ...मुझे तैरना भी आता है ...
यु ही टंगा था इतने दिनों से .??
शाम ढले शाख ने आवाज़ दी ...
लौट आओ ..
पर ..पत्ता हुआ उदास
बोला नहीं रही अब ये
मेरे बस की बात
 
 

कुछ हट के ......

एक डायरी लिखा करता था में ..
जब किसी बाग़ में बैठा
तुम्हारा इंतज़ार किया करता था
बाग़ के फूलो से ज्यादा
तुम्हारी यादे महका जाती थी मझे
और उस पल बन जाता था नए किस्सा
मन की गलियों में और फिजा भी महक जाती थी ...
और अब आज भी डायरी हाथ में है
लिखता हूँ हिसाब उसमे .....
और अब तुम्हारी यादे नहीं
तुम्हारी आवाज गूंज जाती है कानो में .....
और फिर बन जाता है नया किस्सा
और चाय की प्याली फिर ठंडी हो जाती है ......

फुहारे

आसमान से बरसता पानी
कभी तेज़ कभी रिमझिम ...
सुखद अहसास है ..
ठंडी हवाओं का चलना
और बालकनी में बैठ
फुहारों से खेलना
लेकिन ..उसी पल याद आती है
कुछ ऐसे लोगो की
जिनके सर पर है खुला आसमान
और खुली सड़के ही है जिनकी बालकनी
क्या वो भी खेलते है इन फुहारों के साथ या
ये फुहारे खेल जाती है उनकी ज़िन्दगियो से ...........

Thursday, September 27, 2012

लाडली

 

तुमसे है मेरे आँगन में धुप और छाया
तुम ही से तो मेरे बाग़ में फुल मुस्कुराया

तुम हो तो कड़ी धुप भी सुहानी लगती है
तुम से तो बारिश की बूंदे रूहानी लगती है

तुम हो मेरे घर के मंदिर की पूजा
तुम हो गणपति के चरणों की दुर्वा

तुम हो तो रोशन है दिवाली के दिए
तुम से निखरे है होली के रंग खिले
तुम हो भाई की कलाई पर चमकती डोरी
तुम से ही होती है त्यौहार की रोनक पूरी

तुम हो तो एक आस है विश्वास है
तुम से जीवन की हर बात में मिठास है .

तुम हो बेटी मेरे जीवन का मान ,
तुम से ही है लाडली सुख और सम्मान .