Saturday, December 31, 2011
Wednesday, December 28, 2011
कविता
एक दिन बुक शेल्फ में कुछ हलचल महसूस हुई
देखा तो एक किताब जो वहा बरसो से बंद थी
कहना चाह रही थी कुछ .....
उठाकर देखा तो किसी कवि की कविताओं का संग्रह था
पन्ने पलट कर देखा तो कवताए बड़ी उदास
फीकी मुस्कराहट के साथ बोली
हर कवि कविता लिखता है .....
हर विषय का ख़याल रखता है
कभी हाल ए दिल तो कभी दिमाग लिखता है
कभी प्यार मोहब्बत , तो कही दर्द और रुसवाई लिखता है
कही उल्लास , उमंग , प्रोत्साहन और नवजीवन लिखता है
पर कभी किसी ने कविता पर कविता लिखनी चाही ??
जीवन के हर पहलू को शब्द देती
फिर भी किसी के मन में ये बात आई ??
जो हर जज्बात की अभिव्यक्ति है
मन में उमड़ती बदली जो बरसती है
कविता बन पन्नो पर दिल का दर्द लिखती है
कविता से इस सवाद को मेने कविता बना दिया
और एक दिन उसे सुना उसका दर्द भुला दिया
फिर वह मुस्कुराई ...फिर से चहकने लगी
आज कविताओं की किताब फिर से दमकने लगी //
देखा तो एक किताब जो वहा बरसो से बंद थी
कहना चाह रही थी कुछ .....
उठाकर देखा तो किसी कवि की कविताओं का संग्रह था
पन्ने पलट कर देखा तो कवताए बड़ी उदास
फीकी मुस्कराहट के साथ बोली
हर कवि कविता लिखता है .....
हर विषय का ख़याल रखता है
कभी हाल ए दिल तो कभी दिमाग लिखता है
कभी प्यार मोहब्बत , तो कही दर्द और रुसवाई लिखता है
कही उल्लास , उमंग , प्रोत्साहन और नवजीवन लिखता है
पर कभी किसी ने कविता पर कविता लिखनी चाही ??
जीवन के हर पहलू को शब्द देती
फिर भी किसी के मन में ये बात आई ??
जो हर जज्बात की अभिव्यक्ति है
मन में उमड़ती बदली जो बरसती है
कविता बन पन्नो पर दिल का दर्द लिखती है
कविता से इस सवाद को मेने कविता बना दिया
और एक दिन उसे सुना उसका दर्द भुला दिया
फिर वह मुस्कुराई ...फिर से चहकने लगी
आज कविताओं की किताब फिर से दमकने लगी //
Thursday, December 8, 2011
आज भी
बचपन में जब ऊँगली थाम कर आपने चलना सिखलाया था
थोडा खुश और थोडा डरा सा में दो कदम चल पाया था .....
आज चल भी पाता हूँ और मंजिल के करीब भी हूँ
सक्षम भी हूँ और निडर भी हूँ ........फिर भी
जरूरत महसूस होती है उस हाथ की
जो अद्रश्य मेरे साथ है पर
महसूस करना चाहता हूँ
उन उंगलियों की पकड़ आज भी ...........
Monday, November 14, 2011
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ

सुबह की धुप में आलस की अंगडाई
सिर्फ में ले सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
नज़रे चुराकर दूध का ग्लास नाली में
में बहा सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
सड़क पर भरे बारिश के पानी में छपाक छयी
में कर सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
दीवारों पर अपनी कल्पना की चित्रकारी में रंग
में भर सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
कही भी रोना , कभी भी हँसना
उसी क्षण अपनी भावनाओ को प्रदर्शित
में कर सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
ये जीवन जो तुम जी रहे हो
में बाद में भी जी सकता हूँ
पर मेरा जीवन सिर्फ में जी सकता हूँ तुम नहीं
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
Thursday, November 10, 2011
शक्ति स्वरूपा का साकार रूप

एक छोटी सी बच्ची को देखा .....
उम्र यही कोई तीन साल की
चोबीस घंटे के साथ में
उसने ना जाने अपने
कितने रूप दिखाए
कभी रसोई में खाना बनाया ..
कभी माँ बन अपनी गुडिया को सुलाया
और कभी थेला टांग साइकल पर बैठ
बाजार जाने का मन बनाया
कभी बन टीचर बच्चो को पढाया
और कभी अपने असली रूप में आ
खुद अपनी माँ की गोद में सर टिकाया
यह सब देखने के बाद मन में आया
इश्वर ने इस लड़की नामक कृति को
क्या खूब बनाया है
इतनी से उम्र में सब समझ में आया
की सिर्फ बेटी बन कर नहीं जीवन चलाना
बहन, दोस्त पत्नी और बहु......
टीचर से ले कर और भी काम है बहुत
हर क्षेत्र में नाम है कमाना
वास्तव में तब समझ में आया
सब देवताओं ने अपनी अपनी शक्तियों से
देवी को बनाया
और शक्ति स्वरूपा का साकार रूप लिए
इस धरती पर लड़की का अवतरण करवाया /
सीख
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