Saturday, December 18, 2010

नतमस्तक स्वीकार करो .........


जब हम छोटे थे ..एक टॉफी भी भगवान् से मागंते
भगवान् प्लीज आज कोई टॉफी गिफ्ट कर दे
फिर पास होने की दुआ मांगते
और फिर हजारो की नोकरी की .........
जीवन की भूल भूलया में क्यों हम भूल जाते
वो तकदीर लिखने वाला सब जानता है
हम नहीं जानते की कही उसने
एक की जगह दो टॉफी
पास से ज्यादा नब्बे प्रतिशत
और लाखो की नोकरी की तकदीर लिखी हो ...................
नहीं जानते हम की कही हमारी चाहते कम हो और
वो देना अधिक चाहता हो ..........
इसलिए मांगो मत ...नतमस्तक स्वीकार करो .........

Wednesday, November 10, 2010

क्यों नहीं स्वीकारते हम


क्या जीवन उचित है पानी जैसा
कहने को शीतल जल
पर तेज बहाव ले जाता है
मानवता ओर शीतलता /
यु तो बेरंग पानी
पर हर रंग में घुल जाये
शायद सीखाता है ,
हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाना/
जब मंजिल नजर आती है तो
राह में चाहे चट्टान आये या मैदान
बना लेता है अपनी राह सबको चीरते हुए /
कुछ गुण ओर कुछ अवगुण
पर स्वीकार्य है सभी को
ओर यही कहा जाता है
जल है तो जीवन है /
फिर क्यों नहीं स्वीकारते हम
अपनों को अवगुणों के साथ ???????

Thursday, October 21, 2010

निंदा ओर आलोचना


जानता है ये मन की निंदा ओर आलोचना करना गलत है
पर फिर भी कभी किसी का अन अपेक्षित स्वभाव
मजबूर कर देता है निंदा करने को ,
बात जबान से निकलती है लेकिन मन कहता है
ये निंदा नहीं आलोचना है
ओर शायद फर्क है निंदा ओर आलोचना में
शब्दों में निंदा का भाव बना देता है कुरुक्षेत्र का मैदान
टकरा जाता है अहम् ओर चूर हो जाते है रिश्ते नाते
लेकिन आलोचना का अर्थ होता है
उस सत्य की खोज जो कभी कभी
छुपी रह जाती है

Saturday, October 16, 2010


एक पहलू जीवन का

जीवन सागर के उस किनारे जैसा
जिसमे समय के साथ कभी
शंख ,सीप मोती मिलते है
तो कभी टूटी फूटी बुरी वस्तुए भी
ओर इन सबका आना होता है
लहरों के साथ ओर
ये तेज ओर धीमी लहरे
जीवन में आने वाले हर शख्स
का बोध करवाती
जैसे किसी के आने से
सुख की अनुभूति होती है ओर
किसी के जाने से ....

Friday, October 8, 2010


लड़की

लड़की उस नन्हे पोधे की तरह ,
जिसे एक बाग़ से उठा बागबान
दुसरे उपवन में लगाता है ...
लेकिन फर्क आ जाता है ,
हवा परिस्थिति ओर माली का
फिर भी जम जाती है जड़े
नए वातावरण में .....
खिलते है फूल ओर खुशबू भी महकती है
क्योकि सुद्रढ़ होते है संस्कार
उसकी नन्ही जड़ो में ................

Wednesday, September 29, 2010


जीवन किसे हाथ .........

जीवन नन्ही पानी की बूँद का ...
गिरे अगर रेतीले रेगिस्तान पर ,
ग़ुम जाता है सूखी रेत पर उसका वजूद ....

ओर बगिया में फूल पर गिरे तो ,
सुकून मिलता है देखने वालो को कुछ पल ,
प्रकर्ती की सुन्दरता कहलाती है ओर
ख़तम हो जाती कुछ देर बाद

लेकिन वही नन्ही सी बूँद ,
स्वाती नक्षत्र में सीप में गिरे तो
मोती बन जाती कर अमर हो जाती
ओर बेशकीमती आभूषण बन अमर हो जाती

सोचने सिर्फ ये है की
इस बूँद का गिरना किसके हाथ है...
कर्म ,किस्मत इश्वर या प्रारब्ध ??????

Saturday, September 25, 2010

बेटियाँ


इश्वर का अप्रतिम उपहार है बेटियाँ

माँ के सुख दुःख की राजदार है बेटियाँ
पिता की तरक्की का आगाज है बेटियाँ

भाई के आँगन की चहचहात है बेटियाँ

सीने में धडकते दिल का अरमान है बेटियाँ
पूनम कीरात बिखरती चांदनी है बेटियाँ

बगिया में खिले फूलो की महक है बेटियाँ

सागर में उठती चंचल तरंगे है बेटियाँ

सुना है वो घर का आँगन जिसके

पेड़ की डाली पर

चिड़िया सी फुदकती ना हो बेटियाँ...